(Published on SVN Times, during COVID as an awareness on the ‘Joblessness’ of our ‘Youth’)
आज पूरा विश्व कोरोना जैसी एक महामारी से गुजर रहा है| लाखों की संख्या में जो मौतें हो रहीं है वो थमने का नाम ले रहीं हैं| बड़े बड़े देशों के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों का दौर भी जारी है |कोरोना यदि किसी के लिए अभिशाप तो किसी के लिए बरदान भी हो सकता है, पर कोई उसमे बरदान को खोजने के लिए प्रयासरत भी है| ये जहाँ एक तरफ लाखों लोगों को बेरोजगारी के रास्ते पे धकेल गया वहीँ पृथ्वी और प्रकृति ने अपने आपको नर्सिंग भी किया है| बात यदि हम अपने देश भारत की करें तो जिस गंगा की सफाई और प्रदुषण के लिए हज़ारों लाख करोड़ खर्च होने के बाद भी काबू नहीं पाया जा सका था, वो आज न केवल पहले से बहुत अधिक साफ़ हो गए वल्कि स्वक्ष भी प्रतीत हो रहे है| जहाँ एक तरफ भारत सरकार स्वरोज़गार और ब्यापार दोनों के लिए प्रयासरत होते हुए देश में सभी के अंदर स्वनिर्मित उद्यमिता का भाव जगाकर चीन जैसे देशों से लोहा लेने का मन बना रही है वहीँ दूसरी तरफ सभी को स्वरोज़गार के लिए भी कदम उठा रही है| क्योंकि वर्तमान में पुरे विश्व में सरकारी नौकरियों की संख्या में भारी गिरावट आ रही है| जब सरकार ने कोरोना महामारी की वजह से उपजे आर्थिक संकट से निपटने के लिए करीब बीस हज़ार करोड़ से भी अधिक आर्थिक पैकेज की घोषणा की तो उसमे भी राजनीति ने अपनी जगह बना ही ली है| ये बात और है कि देश में कुछ लोगों को मुफ्त में खाने की कला में संवैधानिक अधिकार दिखता है, और कुछ लोग देश को चलाने के लिए अपनी मेहनत की कमाई का कुछ हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देना अपना संवैधानिक दायित्व बखूबी समझते है| वहीँ कुछ राजनैतिक दल ये भी उम्मीद लगाए बैठे है कि केंद्र सरकार उनके खाते में आर्थिक पैकेज का हिस्सा डाले और फिर वो लोग अपने अनुसार अपने प्रदेश में खर्च करेंगे|
बात यदि वास्तविक प्रशानिक ब्यवस्था की करें तो आचार्य चाणक्य के अनुसार मुफ्त में किसी को कुछ मिलना भी नहीं चाहिए ,चाहे वो किसी भी पद, जाति ,और संप्रदाय का क्यों न हो | यदि हम केंद्र की वर्तमान सरकार की ही बात करें तो इसने अपना रुख साफ़ कर रखा है, भले ही कुछ लोग उसको समझने में असमर्थ हों या समझना ही नहीं चाहते हों | यदि आप कुछ महीने पहले एक शीर्ष नेता के ब्यान को ध्यान से समझें तो पता चलेगा कि उसपर बहुत सारे चुटकुले भी बने थे और वो ब्यान बहुत चर्चा में भी था | जब उन्होंने देश के संसद में बेरोजगार होने और भीख मांगने से बेहतर *पकोड़ा ब्यापार * की कही तो बिपक्ष से लेकर सभी तथाकथित बौद्धिक वर्ग ने ही नहीं देश के अन्य लोगों ने भी बहुत आलोचना की थी | पर सायद किसी ने पकोड़ा बेचने को इतनी गहराई से समझा होता | बात यदि वो पकोड़े की जगह कुछ और बड़े ब्यापार की भी करते तो उनका ब्यान चर्चा का विषय भी नहीं बनता और सायद इसलिए ही उन्होंने पकौड़े को यहाँ चुना था | उनका उद्देश्य कुछ भी रहा हो पर कुछ तो ब्यान में खास था ? यदि देश के पढ़े लिखे इंजीनियर को पकोड़ा ब्यापार में लगाएंगे तो चर्चा होना स्वाभाविक है | पर उस ब्यान और आज के कोरोना आर्थिक पैकेज को मिला दें तो बहुत कुछ साफ़ हो जायेगा | पर ये समझना उनके लिए असंभव ही है जो अपने स्मार्ट फोन से टिक टाक एप्लीकेशन तक अनइंस्टाल नहीं कर सकते और दिन में चार बार चीन के सामान का बहिस्कार करते हैं | क्या कभी सोचा है कि चीन के सामान का बहिस्कार करना इतना आसान है ? यदि बिना विकल्प तलाशे ही चीन के सामान का आज से ही बहिस्कार कर दिया जाये तो फेसबुक विश्वविद्यालय वाले यही तथाकथित शूरवीर बिना स्मार्ट फ़ोन के दो दिन भी नहीं रह पायेंगे | जैसा कि हम सब जानते हैं कि चीन ने अपने सस्ते सामान के बदौलत 150 से भी अधिक देशों को बंधक बना लिया है | बात यदि भारत की ही करें तो हमारे आस पास के इलेक्ट्रॉनिक सामनों से लेकर रंग , दीवाली के पटाके और भगवान् की मूर्ति तक चीन से आते हैं | क्या आपके पास उसका कोई विकल्प है ? या सिर्फ बिना सोचे समझे चीन के सामान का बहिस्कार करने वालो सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट को देशभक्ति समझना ही मान लिया है? यदि वास्तव में आपके अंदर चीन के सामान का बहिस्कार करने का जज़्बा है तो पहले मेहनत करके उसका विकल्प निकलना होगा |और इन सबसे भी खास बात है वो ये कि हमे बेचना सीखना होगा |
अर्थात पहली बात ये कि आपको बेचना सीखना होगा | और बेचने में भी हर एक वस्तु ,विचार ,ज्ञान को उत्साह पूर्वक लेन देन करने की कला को भी सीखना ही होगा | क्योंकि आज विश्व में वही देश या उद्योगपति आगे है जिसको बेचना आता है | ठीक उसके बिपरीत हमारे देश में लोग बेचने को अपनी शर्मिंदगी समझते है | लोग कहते है कि मैं तो साहब बन गया , मैं तो इंजीनियर हूँ , मैं तो MBA हूँ ,आदि आदि तो क्या मैं पकोड़े बेचूंगा? ये सायद इसलिए कि हम इंडियन हो गए हैं | जिसमे हमने ब्रिटिशर्स से सीखा कि बेचने वाला छोटा होता है | याद रहे बेचता वही है जिसके पास होता है | ब्रिटिशर्स के पास क्या था जो वो बेचने को समझेंगे | यदि हम भारतीय रहते तो हम अपने वो दिन यद् करते जब हम भारत से निर्यात (बेचकर ) करके ही विश्व पर राज करते रहे है | भारत सोने की चिड़िया भी तभी था जब हमें बेचना आता था | हम मसाले ,ज्ञान , कॉटन से लेकर बहुत सारे सामान पुरे विश्व को बेचते थे और बदले में सोना लेते थे | जिसको भी बेचना आगया वही आगे निकल गया | जिसने बेचने में शर्मिंदगी समझ ली वही पीछे रह गया | आज हमारे देश में खासकर तीन समाज को बेचने की कला आती है | जिसमे मारवाड़ी , सिख और गुजराती को मुख्य तौर पर ले सकते हैं |आज देश में ये तीनों समाज औरों से आगे भी है | चीन सामान बेचता है , अमेरिका हथियार और टेक्नोलॉजी बेचता है | कोई देश पर्यटन के माध्यम से अपने देश की सुंदरता बेचता है | यहाँ तक कि कुछ लोग आतंकवाद भी बेचते नज़र आजायेंगे | कोई ज्ञान बेचता है तो कोई कुछ और ,पर जिसने भी बेचने की कला सीख ली वही आगे निकल जाता है | जब आप किसी भी नौकरी के लिए जाते है तो उस विभाग सभी प्रश्नों का सिर्फ एक ही सार होता है कि मैं आपको क्यों खरीदूं ? यदि अपने आपको वहाँ बेच लिया तो आपको नौकरी मिल जाएगी | ठीक उसी प्रकार जिस भी संत महत्मा , मौलवी , पादरी ने अपना ज्ञान बेचने की कला सीख ली तो वो महान ज्ञानी हो जाता है | कोई बाबा अपना स्वदेशी बेचना जनता है तो कोई वक्ता अपने भाषण को बेचना जनता है ,राजनेता अपने वादों को बेचना जानता है और वो आगे निकल जाता है | और इसी बात में यहाँ पकौड़ा बेचने को मात्र एक उदाहरण की तरह समझकर आपको ये बताया गया कि आप बेचना सीखें तभी दुनियां को फिर से नेतृत्व कर पाओगे |जहाँ एक ओर विश्व कोरोना महामारी के समय लड़खड़ाता प्रतीत हो रहा है वहीँ भारत अपने आपको विष्वगुरू की तरफ बढ़ रहा है | आज दुनियां भारत के नेतृत्व का लोहा मान रही है | ये बात और है कि देश के ही एक इंडियन सोच अपने ही देश को नीचे दिखाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है |
दूसरी बात आती है कि भारत का आम नागरिक क्या बेचे ? वो सोचता है कि उसके पास न तो रोज़गार है ,न ही पैसा और न ही बेचने के लिए कोई सामान है |तब हमारे देश की सरकार कहती है कि आप स्वदेशी बेचें ,आप स्वयं निर्मित वस्तु ,ज्ञान ,योग ,आयुर्वेद और अपना हुनर को बेचें, आप नए नए आविष्कार करें और वहां से विश्व कि भलाई के लिए काम करें ,आप टेक्नोलॉजी को आगे लाएं और फिर वो जन जन तक पहुचायें |अर्थात अपनी तर्क शक्ति को भी बेचें | यदि आपके पास पैसा नहीं है तो भारत सरकार आपको सहायता करेगी | पर ये सहायता आदर्श राज्य के लिए चाणक्य नीति के अनुसार मुफ्त में नहीं मिलेगी | आप आगे बढ़ें और देश को आगे बढ़ाएं | एक आदर्श राज्य के लिए ये आवश्यक भी है कि वो अपने नागरिकों को बिना कुछ मुफ्त में बाँटे हर संभव सहयता करना चाहिए | हम ये क्यों भूल जाते है कि मुफ्त और आरक्षण दोनों ने ही देश में सिर्फ अकर्मण्यता को ही बढ़ावा दिया है | यदि कटु शब्दों में कहा जाए तो हम सब कोई भारत सरकार के दामाद नहीं है जो हमारी सेवा में सबकुछ लगा दिया जाए | ये देश हम सबका है ,हमे मिलकर ही मेहनत करनी होगी और आगे बढ़ाना होगा | यहाँ हमें भारतीय सोच और इंडियन सोच के बारे में स्पष्ट होना ही होगा | भारतीय सोच में हमारे सामने यदि खतरनाक से खतरनाक आपत्ति आजाए तब भी हम सबकुछ अपने हुनर और मेहनत से सम्हाल लेते हैं | इंडियन सोच में पहले हम सबसे पहले उस आपत्ति अथवा हालत से लड़ने के लिए आवश्यकताओं की लम्बी सूची प्रशासन / सहयोगियों को सौंप देते है | यदि दूसरी तरफ से हमारी जरूरतें पूरी हो गयीं तो कार्य होगा वरना अपनी हार का ढींगरा अगले के ऊपर फोड़ने में विलम्ब नहीं करते हैं | आज हमारे देशवासियों को भारतीय सोच की आवश्यकता महशुस हो रही है |हमारे नकली ब्यक्तित्व का एक हिस्सा बन गया है कि जब हमें ज्ञान बाँटना होता है तो कहते है कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है | क्या सिर्फ फिल्मों और किताबों में ही अच्छा लगता है कि कोई काम छोटा और बड़ा नहीं होता है ? यदि ये वास्तविकता में भी आप अपनी जीवन शैली में अपनाते है तो पकोड़ा बेचना छोटा कैसे ? अपने देश के लिए तो एक सैनिक जहाँ एक ओर बन्दुक और तोप से लेकर हवाई जहाज तक चलता है ,वही सैनिक आपत्ति में लोगों को अपने कंधे पर उठाकर नदी नाले भी पार करता है | वो कभी नहीं सोचता है कि वो पत्थर और थूंक फेकने वालों को क्यों बचाये ? क्योंकि वो सिर्फ यही सोचता है कि ये देश उसका है, ये लोग उसके हैं |और जिनको ये देश अपना नहीं लगता है वो लोग देश की संपत्ति को नुकशान पहुंचाने में छड़ भर का समय नहीं लगते हैं | और इसीलिए एक सैनिक और देश का हर एक सच्चा नागरिक अपने इस मातृभूमि को भारत माता कहता है | इसलिए कुछ लोगों को इंडियन विचारधारा वाली जीवन शैली से बहार आने का प्रयास करना होगा | अपने देश को आत्म निर्भर बनाने के लिए अब हमें न केवल पकौड़े वल्कि अब हम योग , ज्ञान और देश में निर्मित सामान भी बेचकर चीन के सामान का विकल्प निकालकर पुरे विश्व में स्वदेशी सामान बेचने के लिए काम करना होगा |
अब आपको ये सोचना होगा कि आपके पास कौन सा हुनर है ? आप जिस क्षेत्र में आगे जाने का हुनर रखते हैं ? ये सिर्फ आपको पहचानना होगा | सरकार का काम होगा कि आपके लिए एक स्वास्थ्य माहौल बनाये और आपकी जरुरत के अनुसार आपकी सहायता भी करे |
अब हमें मुफ्त में सरकार से लेने की आदत को बदलना होगा| और यदि कोई भी अच्छी सरकार आपकी सहयता करती है तो उसके बदले में देश के लिए और अधिक वापस करने की आदत डालनी ही होगी| हमारी भारतीय संस्कृति (इंडियन संस्कृति नहीं) में किसी भी दिए हुयी सहायता और उपहार को उससे अधिक वापस करने की प्रथा रही है|महराणा प्रताप जी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि “ऐसा कोई उपहार नहीं ,और ऐसा कोई दुश्मन का वार नहीं जिसको मैंने दोगुना करके वापस न किया हो “| अर्थात आपको अपनी भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रेरित होकर काम करना ही होगा| याद रहे यदि कोई भी सरकार जब आपको कोई सुविधा मुफ्त में देती है तो आपको कायर और अकर्मण्य बनाकर आपको हमेशा के लिए निष्क्रिय करना चाहती है| यहाँ तक कि आपको निष्क्रिय करने के लिए तरह तरह खड्यंत्र भी चलाये जाते हैं| हमें ऐसी सरकारों से भी सावधान होना होगा|और अपने हुनर के अनुसार अपने लिए भी और अपने देश के लिए काम करना होगा|
Hi, Agreed with the approach